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हिज्र

 हिज्र में उसके दिल बेचेन हुआ है जब से, अपने दिल को मैं सीने से लगाकर सोता हूँ! इन्तिज़ार में जागती हैं रात भर अखियाँ, ख्यालों में ही सही तेरा दीदार कराकर सोता हूँ! बहुत बेचेन था दिल मेरा दुनिया की इन रस्मों से, अब मेैं सारी रस्मों से दामन छुड़ाकर जीता हूँ! बहुत शिद्दत की उल्फत थी बिछड़ना कैसे मुमकिन है, इसी एक खुद-फरेबी में मैं दिल बहला के सोता हूँ! मुद्दत कई गुज़रें कई सदियां गुज़र जायें, रहेगी दासतां ज़िन्दा मैं खुद को यूँ बहला के सोता हूँ! कभी जो दर्द में तड़पे तो मुझको तू निदा देना, मैं एक दर्द का मलहम दिल से लगाकर सोता हूँ! जो होना था हुआ है वो चलो जाने भी दो अब तो, खत़ा का है उसे एहसास सुना है वो भी रोता है! हिज्र मनसूब है दर्द से और ये ही मुक़द्दर है, वो भी बेचेन रहता है मैं भी बेचेन रहता हूँ ।

एक शमा मेरे आस-पास रहती है...!

एक शमा मेरे आस-पास रहती है, अपनों की दुआयें जो साथ-२ रहती हैं! खुद से बातें करके भी दिल बहला लेता हूँ मैं, जब कभी तबीयत मेरी उदास रहती है।

ये और बात है......!

जुदा हुये थे कभी हम मगर अभी तो साथ हैं, गुज़र गई है जो रात वो अब गुज़री बात है! ढूंडते ढूंडते थक गई हैं ये आँखें तुझको, तू मेरे साथ था ये और बात है! कैंसे कह दूँ कि दर्द नहीं है कोई दिल मे मेरे, चेहरे पर जो मुस्कुराहट है ये और बात है! क्या बिगाड़ेंगे दुश्मन मेरा तेरे होते हुये, तू ही हो गर उनका रफीक़ तो ये और बात है! सारी अच्छाईयाँ हैं मन्सूब तुझसे मेरे यार, हम से ही हो खता गर तो ये और बात है! कैसे करूं बयां अपनी खुशी को मेैं, हम मिल कर करें बयां तो ये और बात है!

जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...?

 अब देखो ना जान सफर पर जाना कैंसा... जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...? जब इतने लम्हे गुज़ारे हैं इन्तिज़ार मे मैंने... तो इस आखिरी लम्हे मे बिखर जाना कैंसा....? साक़ी और भी थे और भी मैखाने थे.... बस एक बुत ही नहीं हज़ारों सनमखाने थे...! जहाँ तेरी याद मे गुज़ारी थीं कई राते मैंने... सिर्फ साक़ी ही नहीं बुत भी वहाँ के मेरे दीवाने थे..! अब इस हाल को पहुँचे हैं कि साक़ी न सनम है, बस बाक़ी है मेरी जान और साथ मे गम है...! जब ग़म हर हाल का साथी है तो उसको भुलाना कैंसा... तू तो गैरों का मसीहा है ज़ख्म तुझको दिखाना कैंसा...? छोड़ा था मुझे उस हाल मे जब तेरी तलब थी, अब जो भी हो मेरा हाल तुझे अपना बनाना कैंसा...? अब देखो ना जान सफर पर जाना कैंसा... जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...?

फूलों की तरह खिलना!

 फूलों की तरह खिलना, अपनों की तरह मिलना, बनके मेरा हमसफर... तू साथ मेरे चलना। हर दर्द मे आकर के, सर कांधे पे मेरे रखना! तन्हाई सताये जब... तू बात मुझे करना। जाना हो तुझे गर तो, जाना मुझे कहकर के, कहीं दम न निकल जाये... बस याद तू ये रखना। रहने को हमेशा तू, रहता है मेरे दिल मे, कहीं मसकन न उजड़ जाये... इस पर तू नज़र रखना। मेरी आँख खुलेगी जब, सब कुछ ही जुदा होगा, जो महमान था ख्वाब मे... उसे याद मगर रखना।

क्यूँ नहीं?

 बुलाता है मगर आता क्यूँ नहीं, फूल है तो मुर्झाता क्यूँ नहीं? तेरी खुशबू बहुत दिल-फरेब है, तू मगर इतराता क्यूँ नहीं? बहुत नासाज़ हैं मिज़ाज मेरे, तू मेरा दिल बहलाता क्यूँ नहीं? कांटों के नर्गे मे बड़ा पुर सुकून लगता है, दुश्मन हूँ मैं तेरा मुझ पर झुंझलाता क्यूँ नहीं? ऐ दोस्त तू मेरे सवालों से पक नहीं गया? अगर ऐंसा है तो ज़मीं पर आता क्यूँ नहीं?

मसनूई!

मसनूई खुशबू इन गुलाबों में है, जो फूल अभी तेरे हाथों में हैं! भीगी पलकों मे देखूँगा उसे एक दिन, मोहब्बत अभी तक जिसके ख्यालों में है। उस खुश्क फूल मे खुशबू बाक़ी है अभी, जो  कभी रखा था मैंने किताब में! इस फूल की हालत तो देखो, जो अभी भी तेरे बालों में है। वादों की कश्ती मे सवार होकर चले थे, वो अपनों की जुदाई से दो-चार होकर चले थे! बेरहम सहरा ने जकड़ रखा है उनहें, जो मन्ज़िल की उम्मीद में सिर्फ पतवार लेकर चले थे। मुझे यक़ीन था कि वो खुद को ढूंड लेगा एक दिन, जिस तरह वो ज़ादे-सफर साथ लेकर चला था! कैसे करें शिकायत उससे कि भूला नहीं है वो, जबकि मुद्दत हुई वो अभी तक मेरे ख्यालों में है।

तब्दीली!

 फसीलों पे लहराती यादों के वास्ते, आओ चलें फिर नये इरादों के वास्ते! जो कमाया था सदियों में वो सब कुछ ही खो गया, चलो फिर चलें कुछ कमाने के वास्ते! सहरा न रोक पाये थे कभी रास्ता तेरा, अब कुत्ते खड़े हैं राह में तुझे रोकने के वास्ते! तेरे होसलों ने जगाया था कभी गैरों को नींद से, अब तेरी काविशें हैं सब सोने के वास्ते! कभी रफाक़त तेरी बहुत नायाब थी उसे, अब रक़ाबत तेरी ज़रूरी है उसे; जीने के वास्ते! खुद को बहलाते बहलाते कहाँ तक आ गये हम, कि गीदड़ों के नर्गे में हैं हम हिफाज़त के वास्ते! ऐ 'आस' ख्वाबों की दुनिया से बाहर निकल ज़रा, इजाज़त तुझे ज़रूरी है कुछ कहने के वास्ते।

आज के अखबार!

 ये अब ऐतिबार के क़ाबिल नहीं रहे, इख्तियार जब से इनको कामिल नहीं रहे! पूड़ी सब्जी बांधना हो तो अलग बात है, वर्ना ये अखबार अब ख़रीदने के क़ाबिल नहीं रहे।

गैरों के तरफदार!

 देखूँ में जिस तरफ अगियार नज़र आते हैं, अपनी सफों में भी गैरों के तरफदार नज़र आते हैं! रहबर ही खौफ में हों जिस कौ़म के ऐ 'आस' उस कौ़म के उरूज के कब आसार नज़र आते हैं।

बाबर की बाबरी!

 वो राह अपनी हमवार किये जाते हैं, अहसास हमारे मगर बीमार नज़र आते हैं! बाबर की बाबरी तो रास्ता थी फक़त, वो पूरे देश को ही मुसमार किये जाते हैं ।

دیکھو نہ دور تم حاضر یہ دور ہے!

دیکھو نہ دور تم حاضر یہ دور ہے،  انصاف اب جہاں میں زندہ درکور ہے!  مظلوم کی آہ پر خاموش ہیں سبھی،  ظالم کی ہمایت میں زوروں کا شور ہے!  وقت کی نزاقت ہے؛ لمحئہِ فکر ہے،  رہبر یہ کہ رہے ہیں؛ یہ صبر کا دور ہے!  قدرت کو للکارتی یہ انسانی کاوشیں،  اب دین پر جمنے اور جمانے کا دور ہے!  جاہل جب لے رہے ہیں اماموں کا امتحان،  فتنوں سے اب خود کو بچانے کا دور ہے!  دشمن کے رفیق بن گئے ہیں صاحبِ مال لوگ،  یہ غریبوں کی آبرو بچانے کا دور ہے!  زندہ دلی کا ثبوت مانگتی ہے قوم اب،  دھڑکنِ قلب اب؛ محسوس کرانے کا دور ہے!

दोखो न दूर तुम हाज़िर ये दौर है!

दोखो न दूर तुम हाज़िर ये दौर है, इन्साफ अब जहाँ में ज़िन्दा दरकोर है! मज़लूम की आह पर खामोश हैं सभी, ज़ालिम की हिमायत में ज़ोरों का शोर है! वक़्त की नज़ाक़त है; लम्हा-ऐ-फिक्र है, रहबर ये कह रहे हैं; ये सब्र का दौर है! कुदरत को ललकारती ये इनसानी काविशें, अब दीन पर जमने और जमाने का दौर है! जाहिल जब ले रहे हैं इमामों के इम्तिहान, फितनों से अब खुद को बचाने का दौर है! दुश्मन के रफीक़ बन गये हैं साहिब-ऐ-माल लोग, ये गरीबों की आबरू बचाने का दौर है! ज़िन्दादिली का सबूत मांगती है क़ौम अब, धड़कन-ऐ-क़ल्ब अब; महसूस कराने का दौर है!

तू मेरे गाँव में मशहूर बहुत है!

मेरे गाँव मे तु मशहूर बहुत है, तेरा शहर मगर दूर बहुत है! खोलकर नादानियों की किताब बैठा हूँ में, उसमें किस्सा हमारा मशहूर बहुत है! यादें हमारी संभालकर रखना ज़रा, यहाँ भूल जाने का दसतूर बहुत है! जानता हूँ मुलाक़ात भी मुमकिन नहीं अब, मगर उम्मीद बनाये रखने में सुकून बहुत है! सुबह में खिलते गुलाब की तरह हो तुम, जानां गुलाब हमारे यहाँ मशहूर बहुत है!

इब्तिदा-ऐ-इश्क़!

कहते हैं इजाज़त लेकर वो उनसे बात करते हैं, कुछ इस तरह से वो दिन की शुरूआत करते हैं! सैकड़ों खामियाँ हों उसमें उसे मन्ज़ूर हैं वो सब, इस मुलाक़ाती वसीले पर वो अब भी नाज़ करते हैं! कहाँ बाक़ी हैं अब उसको दीगर शौक़  ज़माने के, उस एक ही शौक़ पर वो सारे शौक़ असर-अन्दाज़ करते हैं! यक़ीनन बहुत ही हसीन होंगी वादियाँ उसकी (जन्नत), मकीन जिसके ज़माने को नज़रअन्दाज़ करते हैं! मैंने देखा नहीं उसको मगर बहुत ही खास होगी वो, क्योंकि पसंद अपनी ज़माने में वो अपनी-आप रखते हैं!

बताने दो!

उसको मेरी गुफ्तुगू का अन्दाज़ बताने दो, वो भी अपना ही तो है हर राज़ बताने दो! कांटों से ज़ख्म खाना कोई नई बात नहीं, जो फूलों से ज़ख्म खाये हैं वो बात बताने दो! इतनी भी सहल नहीं ज़िन्दगी जितनी दिखती है, हर लम्हा नई कहानी है एक लम्हा तो मुस्कुराने दो! बिखर जाओगे तन्हा दूर तक जाओगे अगर, ज़रा ठहरो किसी खेरख्वाह को साथ आने दो। स्याही के दाग तो मिट ही जायेंगे आस, दिलों के मैल को भी तो ज़रा गलाने दो! उसको मेरी गुफ्तुगू का अन्दाज़ बताने दो, वो भी अपना ही तो है हर राज़ बताने दो!

لفظوں کا کھیل

ہر   شئ    زمانہ    کی   فناء   ہوتی   ہے،  ہر بات   کہاں   لب    سے   بیاں  ہوتی  ہے!  صاحبِ  دل  ہو تو  جانتے   ہوگے   یہ  بھی،  بات   دل کی   کب  لفظوں   میں   بیاں   ہوتی  ہے!  بقول  اسے   محسوس  کیا  جا  سکتا ہے،  مگر  یہ  حقیقت  بھی   حسّاسوں  پر  عیاں  ہوتی ہے!  جانے  والے  لوٹ  ہی آتے  ہیں  ایک  وقت  کے  بعد،  مگر   کب  لوٹتے  ہیں  وہ  جن سے  زندگی   خفا  ہوتی  ہے!  عاس !  لفظوں  کا  کھیل   چلے  گا  کب  تک؟  بکھرے  ہوئے  ہر-۲ لفظ  کی  ایک  زباں  ہوتی  ہے!

लफ्ज़ों का खेल!

हर शय ज़माने की फना होती है, हर बात कहाँ लब से बयां होती है! साहिब-ऐ-दिल हो तो जानते होगे ये भी, दिल की तकलीफ कब लफ्ज़ों में बयां होती है! कहते हैं उसे महसूस किया जा सकता है, मगर ये हक़ीक़त भी हस्सासों पर अयां होती है! जाने वाले लोट ही आते हैं एक वक़्त के बाद, मगर कब लोटते हैं वो जिनसे ज़िन्दगी ख़फा होती है! आस ये लफ्ज़ों का खेल चलेगा कब तलक, बिखरे हुये हर-२ लफ्ज़ की एक ज़ुबां होती है!

تم نہ سمجھ سکو شاید!

بڑا   نازک   سا  رشتہ  ہے ،  تم  نہ  سمجھ  سکو  شاید!  وہ شخص؛  لگتا  مجھے  فرشتہ  ہے تم نہ  سمجھ سکو  شاید!  بڑا   معصوم   دکھتا   ہے  بڑی  شوخی  جھلکتی  ہے،  اگر   وہ ساتھ میں  ہو تو  ہر   شئ   اچھی   لگتی  ہے۔ وہ   میرے   سامنے ہوکر   بھی   کوسوں   دور  ہوتا  ہے،  اینسا   کینسے   ہوتا  ہے؛  تم   نہ  سمجھ  سکو   شاید!  میخانے   ہزاروں ہیں  ہزاروں  انمیں  ساقی  ہیں،  ہمیں  سیراب   کرنے  کو  صرف  انکی  آنکھیں  کا فی  ہیں۔ یہ  دیوانہ   ہے  کہنے  دو   اپنے  شہر  میں   رہنے  دو،  طبیبوں  کا  یہ  نسخہ...

तुम ना समझ सको शायद!

बड़ा नाज़ुक सा रिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद! वो शख्स! लगता मुझे फरिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद! बड़ा मासूम दिखता है बड़ी शोखी झलकती है, अगर वो साथ में हो तो हर शय अच्छी लगती है! वो मेरे सामने होकर भी कोसों दूर होता है, ऐंसा कैंसे होता है? तुम न समझ सको शायद! मेखाने हज़ारों हैं हज़ारों उनमें साक़ी हैं, हमें सेराब करने को सिर्फ उनकी आँखें काफी हैं! ये दीवाना है कहने दो अपने शहर में रहने दो, तबीबों का ये नुस्खा है तुम ना समझ सको शायद! बड़ा नाज़ुक सा रिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद! वो शख्स! लगता मुझे फरिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद!