रेत पर लिखा था जो अफसाना मेरे दिल का, मिट गया वो एक पल में मौजों की शरारत से। यादें फिर चली आयीं खाली हाथ मेले में, इंतिज़ार था जिसका वो आया ना रफाक़त से। रेत पर बनाया था शामयाना कभी हमने, ढ़ह गया वो भी एक दिन इंतिज़ार-ऐ-मकीं करके। जा कबूतर जा उसको हाल अब सुना मेरा, कि खो दिया मेंने खुद को उसकी आरज़ू करके।