राख को मत कुरेदिये,
एहसास को मत कुरेदिये,
जो लगी है इस दिल में,
उस आग को मत कुरेदिये।
घर उसका जल रहा है,
जनाज़ा निकल रहा है,
साहब देख रहे हैं,
पानी मत कुड़ेलिये।
डर डर के बात मत कर,
कहना है जो भी कह दे,
बहरो की है अदालत,
न उम्मीद-ऐ-अद्ल छोड़िये।
लिखने को दिल नहीं था,
बस लिख दिया है कुछ भी,
अरे मौसम गरम बहुत है,
ज़ख्मों को न कुरेदिये।