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Showing posts from September, 2020

अपने वुजूद की लड़ाई

अपने वुजूद की लड़ाई खुद लड़नी पढ़ती है,  कोई गैर नहीं आता खुद को मिटाने के लिये। 

ऐ-ज़िन्दगी...!

 ज़िन्दगी मे अगर अपनों के खोने का ग़म न होता, ऐ-ज़िन्दगी! मार के ठोकर तुझको कब के गुज़र जाते हम।

जहाँ चाहने वाले होते हैं...!

 जहाँ से भी गुज़रो तुम नज़र अतराफ में रखना, हासिद भी वहीं मिलते हैं जहाँ चाहने वाले होते हैं।

फिर एक दफा....

हज़ारों रास्तों से गुज़र कर भी मैं वहीं पहुँचा, फिर एक दफा मेरे हिस्से में सिर्फ सफर आया।

हिज्र

 हिज्र में उसके दिल बेचेन हुआ है जब से, अपने दिल को मैं सीने से लगाकर सोता हूँ! इन्तिज़ार में जागती हैं रात भर अखियाँ, ख्यालों में ही सही तेरा दीदार कराकर सोता हूँ! बहुत बेचेन था दिल मेरा दुनिया की इन रस्मों से, अब मेैं सारी रस्मों से दामन छुड़ाकर जीता हूँ! बहुत शिद्दत की उल्फत थी बिछड़ना कैसे मुमकिन है, इसी एक खुद-फरेबी में मैं दिल बहला के सोता हूँ! मुद्दत कई गुज़रें कई सदियां गुज़र जायें, रहेगी दासतां ज़िन्दा मैं खुद को यूँ बहला के सोता हूँ! कभी जो दर्द में तड़पे तो मुझको तू निदा देना, मैं एक दर्द का मलहम दिल से लगाकर सोता हूँ! जो होना था हुआ है वो चलो जाने भी दो अब तो, खत़ा का है उसे एहसास सुना है वो भी रोता है! हिज्र मनसूब है दर्द से और ये ही मुक़द्दर है, वो भी बेचेन रहता है मैं भी बेचेन रहता हूँ ।

एक शमा मेरे आस-पास रहती है...!

एक शमा मेरे आस-पास रहती है, अपनों की दुआयें जो साथ-२ रहती हैं! खुद से बातें करके भी दिल बहला लेता हूँ मैं, जब कभी तबीयत मेरी उदास रहती है।

ये और बात है......!

जुदा हुये थे कभी हम मगर अभी तो साथ हैं, गुज़र गई है जो रात वो अब गुज़री बात है! ढूंडते ढूंडते थक गई हैं ये आँखें तुझको, तू मेरे साथ था ये और बात है! कैंसे कह दूँ कि दर्द नहीं है कोई दिल मे मेरे, चेहरे पर जो मुस्कुराहट है ये और बात है! क्या बिगाड़ेंगे दुश्मन मेरा तेरे होते हुये, तू ही हो गर उनका रफीक़ तो ये और बात है! सारी अच्छाईयाँ हैं मन्सूब तुझसे मेरे यार, हम से ही हो खता गर तो ये और बात है! कैसे करूं बयां अपनी खुशी को मेैं, हम मिल कर करें बयां तो ये और बात है!

जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...?

 अब देखो ना जान सफर पर जाना कैंसा... जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...? जब इतने लम्हे गुज़ारे हैं इन्तिज़ार मे मैंने... तो इस आखिरी लम्हे मे बिखर जाना कैंसा....? साक़ी और भी थे और भी मैखाने थे.... बस एक बुत ही नहीं हज़ारों सनमखाने थे...! जहाँ तेरी याद मे गुज़ारी थीं कई राते मैंने... सिर्फ साक़ी ही नहीं बुत भी वहाँ के मेरे दीवाने थे..! अब इस हाल को पहुँचे हैं कि साक़ी न सनम है, बस बाक़ी है मेरी जान और साथ मे गम है...! जब ग़म हर हाल का साथी है तो उसको भुलाना कैंसा... तू तो गैरों का मसीहा है ज़ख्म तुझको दिखाना कैंसा...? छोड़ा था मुझे उस हाल मे जब तेरी तलब थी, अब जो भी हो मेरा हाल तुझे अपना बनाना कैंसा...? अब देखो ना जान सफर पर जाना कैंसा... जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...?

फूलों की तरह खिलना!

 फूलों की तरह खिलना, अपनों की तरह मिलना, बनके मेरा हमसफर... तू साथ मेरे चलना। हर दर्द मे आकर के, सर कांधे पे मेरे रखना! तन्हाई सताये जब... तू बात मुझे करना। जाना हो तुझे गर तो, जाना मुझे कहकर के, कहीं दम न निकल जाये... बस याद तू ये रखना। रहने को हमेशा तू, रहता है मेरे दिल मे, कहीं मसकन न उजड़ जाये... इस पर तू नज़र रखना। मेरी आँख खुलेगी जब, सब कुछ ही जुदा होगा, जो महमान था ख्वाब मे... उसे याद मगर रखना।