अब देखो ना जान सफर पर जाना कैंसा...
जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...?
जब इतने लम्हे गुज़ारे हैं इन्तिज़ार मे मैंने...
तो इस आखिरी लम्हे मे बिखर जाना कैंसा....?
साक़ी और भी थे और भी मैखाने थे....
बस एक बुत ही नहीं हज़ारों सनमखाने थे...!
जहाँ तेरी याद मे गुज़ारी थीं कई राते मैंने...
सिर्फ साक़ी ही नहीं बुत भी वहाँ के मेरे दीवाने थे..!
अब इस हाल को पहुँचे हैं कि साक़ी न सनम है,
बस बाक़ी है मेरी जान और साथ मे गम है...!
जब ग़म हर हाल का साथी है तो उसको भुलाना कैंसा...
तू तो गैरों का मसीहा है ज़ख्म तुझको दिखाना कैंसा...?
छोड़ा था मुझे उस हाल मे जब तेरी तलब थी,
अब जो भी हो मेरा हाल तुझे अपना बनाना कैंसा...?
अब देखो ना जान सफर पर जाना कैंसा...
जब तुम आये ही नहीं तो मिलना मिलाना कैंसा...?

