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संस्कार और सरकार

किसी ने कहा! संस्कार ही अपराध रोक सकते हैं, सरकार नहीं! मेरा मानना यह है कि; संस्कार और सरकार एक सिक्के के दो पहलू हैं... जहाँ संस्कार हों वहाँ सरकार की ज़रूरत नहीं! जहाँ संस्कार न हों वहाँ सरकार की ज़रूरत पड़ती है! किसी एक जगह पर उपस्थित भीड़ के सभी लोग संस्कारी नहीं होते, असंस्कारी सिर्फ इसलिये अपराध नहीं कर पाते... क्यूँकि वो डरते हैं... कानून से, पुलिस से, लोग क्या कहेंगे, किसी ने देख लिया तो आदि से।

अपने वुजूद की लड़ाई

अपने वुजूद की लड़ाई खुद लड़नी पढ़ती है,  कोई गैर नहीं आता खुद को मिटाने के लिये। 

ऐ-ज़िन्दगी...!

 ज़िन्दगी मे अगर अपनों के खोने का ग़म न होता, ऐ-ज़िन्दगी! मार के ठोकर तुझको कब के गुज़र जाते हम।

जहाँ चाहने वाले होते हैं...!

 जहाँ से भी गुज़रो तुम नज़र अतराफ में रखना, हासिद भी वहीं मिलते हैं जहाँ चाहने वाले होते हैं।

फिर एक दफा....

हज़ारों रास्तों से गुज़र कर भी मैं वहीं पहुँचा, फिर एक दफा मेरे हिस्से में सिर्फ सफर आया।

हिज्र

 हिज्र में उसके दिल बेचेन हुआ है जब से, अपने दिल को मैं सीने से लगाकर सोता हूँ! इन्तिज़ार में जागती हैं रात भर अखियाँ, ख्यालों में ही सही तेरा दीदार कराकर सोता हूँ! बहुत बेचेन था दिल मेरा दुनिया की इन रस्मों से, अब मेैं सारी रस्मों से दामन छुड़ाकर जीता हूँ! बहुत शिद्दत की उल्फत थी बिछड़ना कैसे मुमकिन है, इसी एक खुद-फरेबी में मैं दिल बहला के सोता हूँ! मुद्दत कई गुज़रें कई सदियां गुज़र जायें, रहेगी दासतां ज़िन्दा मैं खुद को यूँ बहला के सोता हूँ! कभी जो दर्द में तड़पे तो मुझको तू निदा देना, मैं एक दर्द का मलहम दिल से लगाकर सोता हूँ! जो होना था हुआ है वो चलो जाने भी दो अब तो, खत़ा का है उसे एहसास सुना है वो भी रोता है! हिज्र मनसूब है दर्द से और ये ही मुक़द्दर है, वो भी बेचेन रहता है मैं भी बेचेन रहता हूँ ।

एक शमा मेरे आस-पास रहती है...!

एक शमा मेरे आस-पास रहती है, अपनों की दुआयें जो साथ-२ रहती हैं! खुद से बातें करके भी दिल बहला लेता हूँ मैं, जब कभी तबीयत मेरी उदास रहती है।

आज के अखबार!

 ये अब ऐतिबार के क़ाबिल नहीं रहे, इख्तियार जब से इनको कामिल नहीं रहे! पूड़ी सब्जी बांधना हो तो अलग बात है, वर्ना ये अखबार अब ख़रीदने के क़ाबिल नहीं रहे।

नींद में चलते-२ !

 नींद में चलते-२ कहाँ तक जाते हम, जहाँ आँख खुली बस वहीं ठहर गये!

ढ़ूडतेे-२ !

 ढूंडते-२ थक सा गया हूँ मैं, क्यूँ इस-क़दर खोया है तू अपने-ही-आप में?

जहाँ आते हो तुम!

 ख्यालों से भी जाने की बात मत करना, बस एक वो ही तो मुक़ाम है जहाँ आते हो तुम!

असलाफ के क़िस्से...

 असलाफ के क़िस्से सुनाते रहो तुम, घर में ही नगमे गुनगुनाते रहो तुम! गुलामी की ज़नजीर शह-रग़ तक न पहुँचे, तब तक हर सितम पर बस धीरज बंधाते रहो तुम।

जिसे हम चाहते गये!

हम जिसे चाहते गये वो दूर होते गये, चलो अब उसे चाहें जिसे दूर करना है।

गैरों के तरफदार!

 देखूँ में जिस तरफ अगियार नज़र आते हैं, अपनी सफों में भी गैरों के तरफदार नज़र आते हैं! रहबर ही खौफ में हों जिस कौ़म के ऐ 'आस' उस कौ़म के उरूज के कब आसार नज़र आते हैं।

बाबर की बाबरी!

 वो राह अपनी हमवार किये जाते हैं, अहसास हमारे मगर बीमार नज़र आते हैं! बाबर की बाबरी तो रास्ता थी फक़त, वो पूरे देश को ही मुसमार किये जाते हैं ।

हाल पूँछते-२!

हाल पूँछते-२ खुद बेहाल हुये हैं हम, शिकवा है मगर उनका कि भुला दिया हम ने।

वक़्त की क़िल्लत!

वक़्त की क़िल्लत है फराग़त के दिनों मे भी, वो मसरूफ ही अच्छे थे जब मजबूर नहीं थे हम।

इश्क़ का खुमार!

दिल देखता है उसमें कुछ बात अनोखी फिर, ये फिर इश्क़ का खुमार है उतरने दो ज़रा।

अहम!

अहम ये नहीं कि हम कहते क्या हैं, अहम ये है कि तुम समझते क्या हो।

शौक़!

तन्हाईयों से गुफ्तगू का शौक़ लिये हुये, वो महफिलों से जा मिले एक अजनबी की तरह!