Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2020

जाते जाते एक बात बताते जाओ...

जाते जाते एक बात बताते जाओ... अब तक हर शख्स को आज़माया तुम ने!  क्या कोई अपने जैंसा भी पाया तुम ने?

महसूस कर सको तो!

महसूस कर सको तो आओ करायें तमको, वर्ना जाने भी दो अब क्या बतायें तुमको!

उल्फत-ऐ-खुदा!

उल्फत-ऐ-खुदा में 'आस' बड़ा मुख्तलिफ सा हाल था, खुश था वो जो चला गया; जो ठहर गया उसे मलाल था!

मुख्तसर!

कहाँ वक़्त है अब दास्तानें सुनने का, तुम अपनी बातों को मुख्तसर कहा करो!

دیکھو نہ دور تم حاضر یہ دور ہے!

دیکھو نہ دور تم حاضر یہ دور ہے،  انصاف اب جہاں میں زندہ درکور ہے!  مظلوم کی آہ پر خاموش ہیں سبھی،  ظالم کی ہمایت میں زوروں کا شور ہے!  وقت کی نزاقت ہے؛ لمحئہِ فکر ہے،  رہبر یہ کہ رہے ہیں؛ یہ صبر کا دور ہے!  قدرت کو للکارتی یہ انسانی کاوشیں،  اب دین پر جمنے اور جمانے کا دور ہے!  جاہل جب لے رہے ہیں اماموں کا امتحان،  فتنوں سے اب خود کو بچانے کا دور ہے!  دشمن کے رفیق بن گئے ہیں صاحبِ مال لوگ،  یہ غریبوں کی آبرو بچانے کا دور ہے!  زندہ دلی کا ثبوت مانگتی ہے قوم اب،  دھڑکنِ قلب اب؛ محسوس کرانے کا دور ہے!

दोखो न दूर तुम हाज़िर ये दौर है!

दोखो न दूर तुम हाज़िर ये दौर है, इन्साफ अब जहाँ में ज़िन्दा दरकोर है! मज़लूम की आह पर खामोश हैं सभी, ज़ालिम की हिमायत में ज़ोरों का शोर है! वक़्त की नज़ाक़त है; लम्हा-ऐ-फिक्र है, रहबर ये कह रहे हैं; ये सब्र का दौर है! कुदरत को ललकारती ये इनसानी काविशें, अब दीन पर जमने और जमाने का दौर है! जाहिल जब ले रहे हैं इमामों के इम्तिहान, फितनों से अब खुद को बचाने का दौर है! दुश्मन के रफीक़ बन गये हैं साहिब-ऐ-माल लोग, ये गरीबों की आबरू बचाने का दौर है! ज़िन्दादिली का सबूत मांगती है क़ौम अब, धड़कन-ऐ-क़ल्ब अब; महसूस कराने का दौर है!

तू मेरे गाँव में मशहूर बहुत है!

मेरे गाँव मे तु मशहूर बहुत है, तेरा शहर मगर दूर बहुत है! खोलकर नादानियों की किताब बैठा हूँ में, उसमें किस्सा हमारा मशहूर बहुत है! यादें हमारी संभालकर रखना ज़रा, यहाँ भूल जाने का दसतूर बहुत है! जानता हूँ मुलाक़ात भी मुमकिन नहीं अब, मगर उम्मीद बनाये रखने में सुकून बहुत है! सुबह में खिलते गुलाब की तरह हो तुम, जानां गुलाब हमारे यहाँ मशहूर बहुत है!

इब्तिदा-ऐ-इश्क़!

कहते हैं इजाज़त लेकर वो उनसे बात करते हैं, कुछ इस तरह से वो दिन की शुरूआत करते हैं! सैकड़ों खामियाँ हों उसमें उसे मन्ज़ूर हैं वो सब, इस मुलाक़ाती वसीले पर वो अब भी नाज़ करते हैं! कहाँ बाक़ी हैं अब उसको दीगर शौक़  ज़माने के, उस एक ही शौक़ पर वो सारे शौक़ असर-अन्दाज़ करते हैं! यक़ीनन बहुत ही हसीन होंगी वादियाँ उसकी (जन्नत), मकीन जिसके ज़माने को नज़रअन्दाज़ करते हैं! मैंने देखा नहीं उसको मगर बहुत ही खास होगी वो, क्योंकि पसंद अपनी ज़माने में वो अपनी-आप रखते हैं!

बताने दो!

उसको मेरी गुफ्तुगू का अन्दाज़ बताने दो, वो भी अपना ही तो है हर राज़ बताने दो! कांटों से ज़ख्म खाना कोई नई बात नहीं, जो फूलों से ज़ख्म खाये हैं वो बात बताने दो! इतनी भी सहल नहीं ज़िन्दगी जितनी दिखती है, हर लम्हा नई कहानी है एक लम्हा तो मुस्कुराने दो! बिखर जाओगे तन्हा दूर तक जाओगे अगर, ज़रा ठहरो किसी खेरख्वाह को साथ आने दो। स्याही के दाग तो मिट ही जायेंगे आस, दिलों के मैल को भी तो ज़रा गलाने दो! उसको मेरी गुफ्तुगू का अन्दाज़ बताने दो, वो भी अपना ही तो है हर राज़ बताने दो!

हमराज़!

राज़ों की हिफाज़त पे  मामूर हमें करके, दिल खोल के बैठे हैं हर राह पे शैदाई!

सिलसिला!

सिलसिला जिस से गुफ्तुगू तक न पहुँचा, उसके संग चाँद तक जाना चाहते हैं हम! शौक़ ज़रा मुख्तलिफ रखते हैं ज़माने से, सहरा के सुराब से सेराब होना चाहते हैं हम!

لفظوں کا کھیل

ہر   شئ    زمانہ    کی   فناء   ہوتی   ہے،  ہر بات   کہاں   لب    سے   بیاں  ہوتی  ہے!  صاحبِ  دل  ہو تو  جانتے   ہوگے   یہ  بھی،  بات   دل کی   کب  لفظوں   میں   بیاں   ہوتی  ہے!  بقول  اسے   محسوس  کیا  جا  سکتا ہے،  مگر  یہ  حقیقت  بھی   حسّاسوں  پر  عیاں  ہوتی ہے!  جانے  والے  لوٹ  ہی آتے  ہیں  ایک  وقت  کے  بعد،  مگر   کب  لوٹتے  ہیں  وہ  جن سے  زندگی   خفا  ہوتی  ہے!  عاس !  لفظوں  کا  کھیل   چلے  گا  کب  تک؟  بکھرے  ہوئے  ہر-۲ لفظ  کی  ایک  زباں  ہوتی  ہے!

लफ्ज़ों का खेल!

हर शय ज़माने की फना होती है, हर बात कहाँ लब से बयां होती है! साहिब-ऐ-दिल हो तो जानते होगे ये भी, दिल की तकलीफ कब लफ्ज़ों में बयां होती है! कहते हैं उसे महसूस किया जा सकता है, मगर ये हक़ीक़त भी हस्सासों पर अयां होती है! जाने वाले लोट ही आते हैं एक वक़्त के बाद, मगर कब लोटते हैं वो जिनसे ज़िन्दगी ख़फा होती है! आस ये लफ्ज़ों का खेल चलेगा कब तलक, बिखरे हुये हर-२ लफ्ज़ की एक ज़ुबां होती है!

تم نہ سمجھ سکو شاید!

بڑا   نازک   سا  رشتہ  ہے ،  تم  نہ  سمجھ  سکو  شاید!  وہ شخص؛  لگتا  مجھے  فرشتہ  ہے تم نہ  سمجھ سکو  شاید!  بڑا   معصوم   دکھتا   ہے  بڑی  شوخی  جھلکتی  ہے،  اگر   وہ ساتھ میں  ہو تو  ہر   شئ   اچھی   لگتی  ہے۔ وہ   میرے   سامنے ہوکر   بھی   کوسوں   دور  ہوتا  ہے،  اینسا   کینسے   ہوتا  ہے؛  تم   نہ  سمجھ  سکو   شاید!  میخانے   ہزاروں ہیں  ہزاروں  انمیں  ساقی  ہیں،  ہمیں  سیراب   کرنے  کو  صرف  انکی  آنکھیں  کا فی  ہیں۔ یہ  دیوانہ   ہے  کہنے  دو   اپنے  شہر  میں   رہنے  دو،  طبیبوں  کا  یہ  نسخہ...

तुम ना समझ सको शायद!

बड़ा नाज़ुक सा रिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद! वो शख्स! लगता मुझे फरिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद! बड़ा मासूम दिखता है बड़ी शोखी झलकती है, अगर वो साथ में हो तो हर शय अच्छी लगती है! वो मेरे सामने होकर भी कोसों दूर होता है, ऐंसा कैंसे होता है? तुम न समझ सको शायद! मेखाने हज़ारों हैं हज़ारों उनमें साक़ी हैं, हमें सेराब करने को सिर्फ उनकी आँखें काफी हैं! ये दीवाना है कहने दो अपने शहर में रहने दो, तबीबों का ये नुस्खा है तुम ना समझ सको शायद! बड़ा नाज़ुक सा रिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद! वो शख्स! लगता मुझे फरिश्ता है, तुम ना समझ सको शायद!

हाल-ऐ-दिल !

हाल-ऐ-दिल सुनाते रहो अच्छा लगता है, दिल की बातों से तो ये बच्चा लगता है, ज़ुबां तो झूठ भी बोलती है यक़ीनन, मगर दिल का हर लफ्ज़ सच्चा लगता है!

रूसवाई!

दूर हमसे ज़माने की बुराई हो गई, जुर्म ऐंसा किया कि रूसवा सारी खुदाई हो गई! वक़्त के अहाते में पनाह-गिज़ीन थे हम, खुद से बाहर जो निकले तो रूसवाई हो गई। دور     ہم    سے   زمانے    کی    برائ   ہوگئ،  جرم    اینسا   کیا   کہ   رسواء   ساری   خدائ    ہوگئ،  وقت   کے   احاطہ   میں   پناہ   گزیں   تھے   ہم،  خود    سے   باہر   جو    نکلے   تو   رسوائ   ہو  گئ۔۔۔

कहाँ मिलेगा वो?

तुझको खबर है क्या___कि कहाँ मिलेगा वो, जहाँ दिल झुकेगा तेरा_____वहीं मिलेगा वो! جو  آج  میرے   سامنے   تھا   وہ   منظر    عجیب  تھا ،  وہ   میرے   سامنے  تھا  پر   کسی   اور   کا   حبیب  تھا۔

मन्ज़र!

जो आज मेरे सामने था वो मन्ज़र अजीब था, वो मेरे सामने था पर किसी और का हबीब था! جو  آج  میرے   سامنے   تھا   وہ   منظر    عجیب  تھا ،  وہ   میرے   سامنے  تھا  پر   کسی   اور   کا   حبیب  تھا۔

रूह का तग़्ज़िया!

रूह का तग़्ज़िया भी ज़रूरी है जिस्म के तग़्ज़िये के बाद, हर क़ल्बी बैचेनी का सबब इश्क़ इब्ने-आदम नहीं होता! روح    کا  تغزیہ   بھی   ضروری   ہے   جسم  کے  تغزیہ    کے   بعد  ،  ہر    قلبی    بے  چینی  کا   سبب  عشق ِ  ابنِ آدم   نہیں  ہوتا۔۔۔

अंधेरा!

अंधेरा पूरे वुजूद में है, सुबह का इंतिज़ार कर, सिर्फ चिरागों की रोशनी काफी नहीं यहाँ!

अगर सामने तुम आये न होते!

अगर सामने तुम आये न होते, हमें देख कर मुस्कुराये न होते! सितम हमने खुद पर यूँ ढ़ाये न होते, अगर जानां तुम यूँ पराये न होते! कहने को बहुत बातें कहनी थी तुमसे, अगर वक़्त ने पेहरे बिठाये न होते! अभी साथ लेकर चले जाते तुमको, अगर दस्तूर ज़माने ने बनाये न होते! नहीं आओगे तुम; गर बता देते हमको, यूँ रातों को खुद को जगाये न होते! मर जाते जानां घुट घुट के हम तो, अगर हाल-ऐ-दिल तमको सुनाये न होते! अगर सामने तुम आये न होते, सितम हमने खुद पर यूँ ढ़ाये न होते!