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Showing posts from August, 2020

क्यूँ नहीं?

 बुलाता है मगर आता क्यूँ नहीं, फूल है तो मुर्झाता क्यूँ नहीं? तेरी खुशबू बहुत दिल-फरेब है, तू मगर इतराता क्यूँ नहीं? बहुत नासाज़ हैं मिज़ाज मेरे, तू मेरा दिल बहलाता क्यूँ नहीं? कांटों के नर्गे मे बड़ा पुर सुकून लगता है, दुश्मन हूँ मैं तेरा मुझ पर झुंझलाता क्यूँ नहीं? ऐ दोस्त तू मेरे सवालों से पक नहीं गया? अगर ऐंसा है तो ज़मीं पर आता क्यूँ नहीं?

मसनूई!

मसनूई खुशबू इन गुलाबों में है, जो फूल अभी तेरे हाथों में हैं! भीगी पलकों मे देखूँगा उसे एक दिन, मोहब्बत अभी तक जिसके ख्यालों में है। उस खुश्क फूल मे खुशबू बाक़ी है अभी, जो  कभी रखा था मैंने किताब में! इस फूल की हालत तो देखो, जो अभी भी तेरे बालों में है। वादों की कश्ती मे सवार होकर चले थे, वो अपनों की जुदाई से दो-चार होकर चले थे! बेरहम सहरा ने जकड़ रखा है उनहें, जो मन्ज़िल की उम्मीद में सिर्फ पतवार लेकर चले थे। मुझे यक़ीन था कि वो खुद को ढूंड लेगा एक दिन, जिस तरह वो ज़ादे-सफर साथ लेकर चला था! कैसे करें शिकायत उससे कि भूला नहीं है वो, जबकि मुद्दत हुई वो अभी तक मेरे ख्यालों में है।

तब्दीली!

 फसीलों पे लहराती यादों के वास्ते, आओ चलें फिर नये इरादों के वास्ते! जो कमाया था सदियों में वो सब कुछ ही खो गया, चलो फिर चलें कुछ कमाने के वास्ते! सहरा न रोक पाये थे कभी रास्ता तेरा, अब कुत्ते खड़े हैं राह में तुझे रोकने के वास्ते! तेरे होसलों ने जगाया था कभी गैरों को नींद से, अब तेरी काविशें हैं सब सोने के वास्ते! कभी रफाक़त तेरी बहुत नायाब थी उसे, अब रक़ाबत तेरी ज़रूरी है उसे; जीने के वास्ते! खुद को बहलाते बहलाते कहाँ तक आ गये हम, कि गीदड़ों के नर्गे में हैं हम हिफाज़त के वास्ते! ऐ 'आस' ख्वाबों की दुनिया से बाहर निकल ज़रा, इजाज़त तुझे ज़रूरी है कुछ कहने के वास्ते।

आज के अखबार!

 ये अब ऐतिबार के क़ाबिल नहीं रहे, इख्तियार जब से इनको कामिल नहीं रहे! पूड़ी सब्जी बांधना हो तो अलग बात है, वर्ना ये अखबार अब ख़रीदने के क़ाबिल नहीं रहे।

नींद में चलते-२ !

 नींद में चलते-२ कहाँ तक जाते हम, जहाँ आँख खुली बस वहीं ठहर गये!

ढ़ूडतेे-२ !

 ढूंडते-२ थक सा गया हूँ मैं, क्यूँ इस-क़दर खोया है तू अपने-ही-आप में?

जहाँ आते हो तुम!

 ख्यालों से भी जाने की बात मत करना, बस एक वो ही तो मुक़ाम है जहाँ आते हो तुम!

असलाफ के क़िस्से...

 असलाफ के क़िस्से सुनाते रहो तुम, घर में ही नगमे गुनगुनाते रहो तुम! गुलामी की ज़नजीर शह-रग़ तक न पहुँचे, तब तक हर सितम पर बस धीरज बंधाते रहो तुम।

जिसे हम चाहते गये!

हम जिसे चाहते गये वो दूर होते गये, चलो अब उसे चाहें जिसे दूर करना है।

गैरों के तरफदार!

 देखूँ में जिस तरफ अगियार नज़र आते हैं, अपनी सफों में भी गैरों के तरफदार नज़र आते हैं! रहबर ही खौफ में हों जिस कौ़म के ऐ 'आस' उस कौ़म के उरूज के कब आसार नज़र आते हैं।

बाबर की बाबरी!

 वो राह अपनी हमवार किये जाते हैं, अहसास हमारे मगर बीमार नज़र आते हैं! बाबर की बाबरी तो रास्ता थी फक़त, वो पूरे देश को ही मुसमार किये जाते हैं ।

हाल पूँछते-२!

हाल पूँछते-२ खुद बेहाल हुये हैं हम, शिकवा है मगर उनका कि भुला दिया हम ने।

वक़्त की क़िल्लत!

वक़्त की क़िल्लत है फराग़त के दिनों मे भी, वो मसरूफ ही अच्छे थे जब मजबूर नहीं थे हम।

इश्क़ का खुमार!

दिल देखता है उसमें कुछ बात अनोखी फिर, ये फिर इश्क़ का खुमार है उतरने दो ज़रा।

अहम!

अहम ये नहीं कि हम कहते क्या हैं, अहम ये है कि तुम समझते क्या हो।

शौक़!

तन्हाईयों से गुफ्तगू का शौक़ लिये हुये, वो महफिलों से जा मिले एक अजनबी की तरह!

भ्रम!

शीशों की रफाक़त ने बनाये रखा भ्रम, उनको गुमान था कि वो सबसे हसीन हैं!

खुद-फरेब दुनिया में!

खुद-फरेब दुनिया में बस एक मुसाफिर तू, हर शख्स यहाँ फरिश्ता है बस एक काफिर तू!