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में मुख्तसर हूँ!

में मुख्तसर हूँ!  तू मत आ मेरे आँगन में।  खुश्बू नहीं रही फूलों में!  तू मत झांक अब गुलशन में।  मोसम-ऎ-ख़िज़ां की भेंट चढ़ गये!  वो पत्ते जो सूरज की तपिश को रोकते थे!  अब नहीं रही जगह कोई पेड़ों के आंचल में।  अब सारी सखावतें दिखती हैं ! इंटरनेट की दुनिया में!  तू मत कर तलाश उनको अब अपने आँगन में।  बीमार का इन्तिखाब भी होने लगा है ! धर्म की पहचान से!  अब तो अस्पताल भी हमारे फंस गये हैं ! साम्प्रदायिकता के दलदल में।।

कभी हाल बदलना होगा!

कभी हालत कभी हाल बदलना होगा, मुझको ये तेरा जाल बदलना होगा। नफरतें फैलीं हैं चारों और ठीक है लेकिन, मुझको मेरा अहवाल बदलना होगा। मेंने ज़ाहिर तो संभाला है बड़ी फिक्र से लेकिन, मुझको मेरे बातिन का भी हाल बदलना होगा। मेंने खो दी है विरासत अपने असलाफ की लेकिन, मुझको वापस अब उसी सांचे में ढ़लना होगा। अभी हाल ये है कि बीमार है मेरा सारापा वुजूद, और दरकार ये है कि मरहम मुझे बनना होगा।

कहते हैं!

कहते हैं! वो जो हमनवा था! फलक तक रसाई थी उसकी,  कहते हैं! चाँद भी आता था_उसके दीदार के लिये। कहते हैं!

तुमको शायद याद नहीं!

तुमको शायद याद नहीं! तुमको शायद याद नहीं, वो दिन कैंसे गुज़रे थे! सदियों सा पल गुज़र रहा था! जब दिल के मेरे टुकड़े थे। यादों से दिल को बहला कर, में जिया था जब बरसात में! खुद तोड़े थे सब सपने मेंने, जो बुने थे तेरे साथ में। तुमको शायद याद नहीं, वो दिन कैंसे गुज़रे थे! तुमको शायद याद नहीं!

मुझे मालूम है!

मुझे मालूम है! उजालों में भी अंधेरे ढ़ूडता है! वो कमज़र्फ सिर्फ बहाने ढ़ूडता है । करने को तो सिर्फ बातें शौक हैं उसका, और इस शौक में भी सिर्फ फसाने ढ़ूडता है। हमारे दर्द को वो अपना दर्द कहता है! और इस झूठ को वो सरेआम बोलता है। मुझे मालूम है वो कोई काम कर नहीं सकता, मगर अपने आपको वो माहिर-ऐ-ज़माना बोलता है। मुझे मालूम है!

याद आता नहीं!

याद आता नहीं! याद आता नहीं__कब से में सफर में हूँ, मिल ही जायेगी वो__बस इसी भ्रम में हूँ । आँख खुलती नहीं__चाह के भी अब मेरी, एक हसीन ख्वाब की__इसक़दर जकड़ में हूँ। हैं कई संग मेरे______हमराहा मगर! लग रहा है मुझे__कि तन्हा सफर में हूँ। जला रहा हूँ में क्यूँ___हसरतों के दिये, मुद्दतों से में जब कि_आंधियों के शहर में हूँ। याद आता नहीं!

Hum?

Hum? हालात से कुछ इस तरह जूझने लगे हम, कि अब खुद को ही खुद में ढूंडने लगे हम। वक़्त ने दिखाया शीशा जब भी हमको, खुद को ही अजनबी की तरह घूरने लगे हम। अब इसी तज़ुब्ज़ुब में गुज़र जाते हैं रात दिन, खुद को मुनाफिक़ समझें या मुखलिस कहें हम? अद्ल ने ज़ुल्म के आगे सर-खम कर दिया, अब ठहर कर उसे देखें या चलते रहें हम? वो शख्स फिरऔन बनने की ख्वाहिश रखता है, मज़लूम बनकर झुक जायें या फिर मूसा बनें हम? Hum?